B.Com, NCC, Martial Arts सफाई कर्मी!” सिस्टम पर सवाल सच्ची मुलाकात

आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)
आशीष शर्मा (ऋषि भारद्वाज)

आज सुबह वॉक पर निकला तो सड़क किनारे एक नया सफाई कर्मी दिखा। बाकी लोगों से अलग। चेहरा ढका नहीं था। कपड़े साफ-सुथरे थे और झाड़ू ऐसे चला रहा था जैसे कोई पेंटर कैनवास पर अपनी आखिरी स्ट्रोक दे रहा हो।

उसके काम में जल्दबाज़ी नहीं थी… एक अजीब सा आत्मविश्वास था। उत्सुकता हुई। कदम खुद-ब-खुद उसकी तरफ बढ़ गए।

भाईसाब… NCC, Scout Guide और B.Com किया है

बातचीत शुरू हुई तो कुछ ही मिनटों में समझ आ गया कि सामने खड़ा लड़का सिर्फ सफाई कर्मी नहीं है। वो पढ़ा-लिखा था। NCC किया हुआ। Scout Guide का हिस्सा रह चुका। Martial Arts जानता था। और B.Com पास था।

सबसे ज्यादा ध्यान खींची उसकी बातचीत ने। हिंदी के बीच जब वह इंग्लिश के शब्द बोलता था तो pronunciation ऐसा कि कई एसी कमरों में बैठे लोग भी शर्मा जाएं। उसकी आवाज़ में झिझक नहीं थी। हीन भावना नहीं थी। अपने काम को लेकर शर्म नहीं थी। लेकिन उसके भीतर एक दबा हुआ दर्द जरूर था… और शायद वही सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा था।

सिस्टम की सबसे खामोश त्रासदी

उससे मिलकर अच्छा भी लगा… और भीतर कहीं बहुत बुरा भी। अच्छा इसलिए कि लड़का टूट नहीं गया था। बुरा इसलिए कि सिस्टम ने उसे वहां पहुंचा दिया जहां शायद उसकी मंज़िल नहीं थी। एक ऐसा सिस्टम, जहां डिग्रियां बढ़ती जा रही हैं… लेकिन अवसर सिकुड़ते जा रहे हैं।
जहां हुनर नौकरी नहीं तय करता… vacancy तय करती है। जहां सपनों का valuation अब सिर्फ सरकारी सीटों की संख्या से होने लगा है।

पत्रकारिता के 20 साल और वही सवाल

करीब बीस साल की पत्रकारिता में मैंने अनगिनत तस्वीरें देखी हैं। फोर्थ क्लास सरकारी नौकरी के लिए Masters और PhD किए युवाओं को लाइन में खड़े देखा है। इंटरव्यू हॉल के बाहर उम्मीद और अपमान को एक साथ बैठे देखा है। और अब… B.Com, NCC, Martial Arts जानने वाला लड़का हाथ में झाड़ू लिए मिला। समस्या सफाई कर्मी होना नहीं है। समस्या यह है कि देश का पढ़ा-लिखा युवा अपनी क्षमता से बहुत नीचे की जगहों पर मजबूरी में खड़ा है।

उसने नाम नहीं बताया… मैंने पूछा भी नहीं

मैं उसका नाम लिख सकता था। लेकिन नहीं लिखूंगा। क्योंकि मैंने उससे यह नहीं कहा था कि उसकी कहानी एक दिन सबके सामने रख दूंगा। कुछ कहानियां नाम से नहीं, एहसास से पहचानी जाती हैं। और यह उन्हीं में से एक है।

सवाल सरकारों से ज्यादा समाज से भी है

हम अक्सर बेरोजगारी को सिर्फ आंकड़ों में ढूंढते हैं। लेकिन असली बेरोजगारी सड़क पर दिखाई देती है। वो हर उस युवा के चेहरे पर दिखती है जिसने मेहनत तो पूरी की… लेकिन सिस्टम उसके लिए रास्ता नहीं बना पाया। देश को अब सिर्फ jobs नहीं, dignity based opportunities चाहिए। वरना आने वाले समय में डिग्रियां दीवारों पर टंगी रहेंगी… और हुनर सड़कें साफ करता नजर आएगा।

उस लड़के ने जाते-जाते सिर्फ इतना कहा— “काम कोई छोटा नहीं होता सर…” और सच कहूं, उस एक लाइन ने पूरी बहस खत्म कर दी।काम छोटा नहीं होता। लेकिन सपनों का छोटा हो जाना… शायद सबसे बड़ी त्रासदी है।

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